प्रेरणा कथाएं Motivational Stories
 
दो शब्द

यहाँ आप कुछ बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक कथाएं पढ़ सकते हैं. ये कथाएं तीन पुस्तकों में प्रकाशित हो चुकी हैं. यदि आप इन कथाओं में रूचि रखते हैं तो यहां आप पुस्तक में प्रकाशित कथाएं मुफ्त में पढ़ सकते हैं. यदि आप ये कथाएं अपने फ़ोन, कम्प्यूटर, अथवा अपने लैपटॉप इत्यादि में डाउनलोड करना चाहते हैं तो आप इस लिंक का अनुसरण कर सकते हैं.

किताबों का लिंक:

हमारी शुभकामनाएं आप के साथ हैं

अकबर के तीन प्रश्न

हमेशा की तरह एक दिन सम्राट अकबर ने फिर से बीरबर की परीक्षा लेने का निर्णय लिया और बीरबल के सामने तीन प्रश्न रख दिए. वो प्रश्न थे:

पहला प्रश्न: भगवान कहाँ रहता है?

दूसरा प्रश्न: वह कैसे मिलता है?

और

तीसरा प्रश्न: वह करता क्या है?''

बीरबल इन प्रश्नों के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थे. वो एक दम घबरा गए, पर कुछ समय बाद उन्होंने अपने आप को सम्भाला और अकबर से कहा, "जहाँपनाह, मैं आपके इन तीनो प्रश्नों के उत्तर आपको कल दूंगा."

शाम को जब अकबर और दरबारियों से विदा लेकर बीरबल घर पहुंचे तो वो बहुत ही परेशान थे और ये उनके चेहरे पर स्पष्ट दिख रहा था.

उनके पुत्र ने बीरबल से उनकी अप्रसन्नता का कारण पूछा तो बीरबल ने अपने पुत्र को वो तीन प्रश्न बता दिए.

बीरबल ने अपने पुत्र से कहा, "बेटा कल दरबार में इन तीनो प्रश्नों के उत्तर देने हैं इसीलिए दिमाग कुछ परेशान है."

बीरबल के पुत्र ने कहा- ''पिता जी! कल आप मुझे दरबार में अपने साथ ले चलना मैं बादशाह के प्रश्नों के उत्तर दूँगा।''

पुत्र की हठ के कारण बीरबल अगले दिन अपने पुत्र को साथ लेकर दरबार में पहुँचे।

बीरबल को देख कर बादशाह अकबर ने कहा - ''बीरबल मेरे प्रश्नों के उत्तर दो।

बीरबल ने कहा - ''जहाँपनाह आपके प्रश्नों के उत्तर तो मेरा पुत्र भी दे सकता है।''

अकबर ने बीरबल के पुत्र से पहला प्रश्न पूछा - ''बताओ!  भगवान कहाँ रहता है?''

बीरबल के पुत्र ने एक गिलास शक्कर मिला हुआ दूध बादशाह से मँगवाया और कहा, "जहाँपनाह दूध कैसा है?"

अकबर ने थोड़ा सा दूध पिया और कहा, "दूध मीठा है."

बीरबल के पुत्र ने कहा, "परन्तु बादशाह सलामत क्या आपको इसमें शक्कर दिखाई दे रही है?"

बादशाह बोले, “नही। वह तो घुल गयी।"

बीरबल के पुत्र ने उत्साहपूर्वक कहा, "जी जहाँपनाह, ! भगवान भी इसी प्रकार संसार की हर वस्तु में रहता है। जैसे शक्कर दूध में घुल गयी है परन्तु वह दिखाई नही दे रही है।"

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा - ''बताओ! भगवान मिलता केसे है?''

बीरबल के पुत्र ने कुछ सोचने का अभिनय किया और बादशाह से कह, "जहाँपनाह, थोड़ा दही मँगवाइए।"

बादशाह ने दही मँगवाया तो बीरबल के पुत्र ने कहा< ''जहाँपनाह! क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है।"

बादशाह ने कहा- ''मक्खन तो दही में है पर इसको मथने पर ही दिखाई देगा।''

बीरबल के पुत्र ने कहा- ''जहाँपनाह! मन्थन करने पर ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं।''

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब अन्तिम प्रश्न का उत्तर पूछा - ''बताओ! भगवान करता क्या है?''

बीरबल के पुत्र ने कहा- ''जहाँपनाह! इसके लिए आपको मुझे अपना गुरू स्वीकार करना पड़ेगा।''

अकबर बोले- ''ठीक है, आप गुरू और मैं आप का शिष्य।''

अब बीरबल के पुत्र ने कहा- ''जहाँपनाह गुरू तो ऊँचे आसन पर बैठता है और शिष्य नीचे।"

अकबर ने बीरबल के पुत्र के लिए सिंहासन खाली कर दिया और स्वयं नीचे बैठ गये।

अब बालक ने सिंहासन पर बैठ कर कहा - ''महाराज! आपके अन्तिम प्रश्न का उत्तर तो यही है।''

अकबर बोले- ''क्या मतलब? मैं कुछ समझा नहीं।''

बीरबल के पुत्र ने कहा- ''जहाँपनाह! भगवान यही तो करता है। पल भर में राजा को रंक बना देता है और भिखारी को सम्राट बना देता है।"

अकबर और उनके दरबारी इस उत्तर को सुनकर चकित हो गए. अकबर ने बीरबल के पुत्र को बहुत से उपहार दिए और उसकी और बीरबल की बहुत प्रशंसा की.

मित्रों, हमारे मन में बहुत से ऐसे ही प्रश्न उठते हैं और हम उनके उत्तर खोजते रहते हैं पर वास्तव में उन प्रश्नों के उत्तर बहुत ही साधारण होते हैं.

ये नहीं समझना चाहिए के ज्ञान और बुद्धि का सम्बन्ध मनुष्य की उम्र ओर उसकी पढाई लिखाई से होता है. कभी कभी हम छोटे बच्चों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.

अनूठे प्रयोग

एक बार कुछ वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही रोचक प्रयोग किया. उन्होंने पांच बंदरों को एक पिंजरे में बंद कर दिया और पिंजरे के बीचोबीच एक सीढ़ी लटका दी और उस सीढ़ी के ऊपर कुछ केले लटका दिए.

एक बन्दर की निगाह जब केलों पर पड़ी वो केले लेने के लिए सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने लगा पर वैज्ञानिकों ने तुरंत पानी की एक तेज़ धार बन्दर पर डाल दी. वो बन्दर वहीँ पर रुक गया. वो तुरंत सीढ़ी से नीचे उतर गया.

वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग यहीं नहीं रोके. वो और भी प्रयोग करने लगे. वैज्ञानिकों ने सभी बंदरों को पानी से भीगा दिया और इस तरह एक बन्दर की गलती की सज़ा सभी बंदरों को मिली. वो सबके सब चुप चाप एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गए.

कुछ देर बाद एक दूसरा बन्दर केले खाने के लिए विचलित होने लगा. वो सीढ़ी की और जाने लगा पर इससे पहले के वो ऊपर चढ़ पाता कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..

इस बार भी एक बन्दर की गलती का दण्ड सभी बंदरों को दिया गया और उन सब को पानी से भीगना पड़ा. एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...

कुछ समय बाद जब तीसरा बन्दर केले खाने के लिए सीढ़ी की और जाने लगा तो सभी बंदरों ने मिलकर उसपर आक्रमण कर दिया और उसे केले खाने से रोक दिया, ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..

अब वैज्ञानिकों ने एक और नया प्रयोग किया और अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया...

नए बन्दर को पिंजरे के अंदर के नियम के बारे में कुछ नहीं मालुम था. वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी.

उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे. ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं.

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया.इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी

और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!

प्रयोग अंत होते होते पिंजरे के अंदर के सभी बन्दर बाहर कर दिए गए थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था.

पर उन सभी बंदरों का व्यवहार पुराने बंदरों की तरह ही था. वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते.

मित्रों, हमारे समाज में भी बिलकुल ऐसा ही व्यवहार देखा जा सकता है. जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,चाहे वो कोई भी किसी भी क्षेत्र से सम्बंधित काम हो उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं.

उस व्यक्ति को असफलता का भय दिखाकर उसको वो नया काम करने से रोकने की कोशिश की जाती है.

परन्तु सबसे रोचक बात ये है के उस व्यक्ति को रोकने वाले वो लोग होते हैं जिन्होंने उस काम को खुद कभी भी नहीं किया होता है.

अंत मैं यही निष्कर्ष निकलता है के यदि आप कुछ नया करने के बारे में सोच रहे हैं तो आप को परिवार, समाज, और बहुत से लोगों का विरोध सहने के लिए तैयार रहना होगा.

नया काम करना कोई बुरी बात नहीं है यदि उस काम से औरों को नुक्सान ना हो. बंदरों के मामले में एक बन्दर के कारण सबको दण्ड भोगना पड़ता था इसलिए वो नया काम बुरा था, पर आपके जीवन में कुछ फरक होगा.

कोई भी नया काम जिससे किसी को क्षति न हो और आप का ध्यान पूर्ण केंद्रित हो तो किसी की भी मत सुनिए और अपने पर विशवास करके शुरू कर दीजिये, समय जरूर लगेगा पर आप सफल हो ही जाएंगे.

अभी कर लो माँ बाप की सेवा

एक दिन सुबह सुबह दो दोस्त एक हलवाई की दूकान पर मिले. एक दोस्त का नाम रमेश और दुसरे का नाम मोहन था. मोहन बहुत ही धार्मिक और कर्म काण्ड में विश्वास रखने वाल व्यक्ति था. वो हलवाई की दूकान पर भगवान् को चढाने के लिए लड्डू लेने आया था.

अपने दोस्त रमेश को वहाँ देख कर उसने कहा, "आज तुम हलवाई की दूकान पर कैसे आ गए?"

रमेश ने कहा, "आज मेरी माँ का श्राद्ध है इसीलिए मैं लड्डू लेने आया हूँ. मेरी माँ को लड्डू बहुत पसंद हैं."

मोहन हैरान हो गया और उसने तुरंत कहा, "ये कैसे हो सकता है. मैंने कुछ देर पहले ही तो तुम्हारी माताजी को बाजार में देखा था. वो तो बिलकुल ठीक ठाक हैं. उनका श्राद्ध कैसे हो सकता है. श्राद्ध तो मरे लोगों का होता है."

रमेश मुस्कुराने लगा पर उसने कुछ भी नहीं कहा. ठीक उसी समय रमेश की माँ भी वहाँ आ गयी.

उसने अपनी माँ के कन्धों पर हाथ रख कर कहा, “भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ ।"

मोहन हतप्रभ सा उसको सुनता चला गया.

रमेश ने फिर कहा, "श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ ।

सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ करके मिलता है ।"

मोहन बिलकुल पागल सा उसको और उसकी माँ को देखता रह गया. दोनों माँ बेटा खिलखिलाते हुए मिठाई लेकर अपने घर चले गए.

मित्रों, मैं जानता हूँ की इस कथा में कही गयी बातें श्रद्धालुओं को बुरी लग सकती हैं पर सत्य ही तो कहा है रमेश ने.

हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं । पंडितों को खीर-पुरी खिलाते हैं । रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता ।

माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है ॥ अगर माँ बाप अपने बच्चों के होते हुए बुढ़ापे में अनाथ आश्रम या वृद्धों के लिए बनाये गए घरों में रहे तो कितने भी श्राद्ध हम कर लें हम अपने पाप से मुक्त नहीं हो सकते.

अहसास की ताकत

एक बार एक व्यापारी अपने बहुत से ऊंटों के साथ रेगिस्तान में सफर कर रहा था। काफिले के साथ बहुत से नौकर चाकर भी थे। जब शाम ढलने लगी तो मालिक ने अपने नौकरों को रुकने का आदेश दिया।

काफिले में सब मिलाकर एक सौ ऊंट थे पर उनके पास सिर्फ निन्यानबे रस्सियाँ थी उन ऊंटों को खूटों से बाँधने के लिए. एक ऊंट के लिए रस्सी नहीं थी.  

उन्होंने इधर उधर बहुत खोज पर उनको एक और रस्सी नहीं मिली. सराय के मालिक ने जब यह देख तो उसने कहा, “तुम खूंटी गाड़ने जैसी चोट करो और ऊंट को रस्सी से बांधने का अहसास करवाओ।"

ऊंटों का मालिक सराय के मालिक की बात सुनकर बहुत हैरान हुआ पर उसके पास और कोई रास्ता भी तो नहीं था। इसलिए उसने वैसा ही किया। झूठी खूंटी गाड़ी गई, चोटें की गईं। ऊंट ने चोटें सुनीं और समझ लिया कि बंध चुका है। वह बैठा और सो गया।

सुबह निन्यानबे ऊंटों की खूटियां उखाड़ीं और रस्सियां खोलीं , सभी ऊंट उठकर चल पड़े , पर एक ऊंट बैठा रहा। मालिक को आश्चर्य हुआ – अरे , यह तो बंधा भी नहीं है , फिर भी उठ नहीं रहा है।

सराय के मालिक ने समझाया – तुम्हारे लिए वहां खूंटी का बंधन नहीं है मगर ऊंट के लिए है।

जैसे रात में व्यवस्था की, वैसे ही अभी खूंटी उखाड़ने और बंधी रस्सी खोलने का अहसास करवाओ। मालिक ने खूंटी उखाड़ दी जो थी ही नहीं , अभिनय किया और रस्सी खोल दी जिसका कोई अस्तित्व नहीं था। इसके बाद ऊंट उठकर चल पड़ा।

न केवल ऊंट बल्कि मनुष्य भी ऐसी ही खूंटियों से और रस्सियों से बंधे होते हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं होता। मनुष्य बंधता है अपने ही गलत दृष्टिकोण से, मिथ्या सोच से, विपरीत मान्यताओं की पकड़ से।

ऐसा व्यक्ति सच को झूठ और झूठ को सच मानता है। वह दोहरा जीवन जीता है। उसके आदर्श और आचरण में लंबी दूरी होती है।

इसलिए जरूरी है कि मनुष्य का मन जब भी जागे, लक्ष्य का निर्धारण सबसे पहले करे। बिना उद्देश्य मीलों तक चलना सिर्फ थकान, भटकाव और नैराश्य देगा, मंजिल नही।

स्वतंत्र अस्तित्व के लिए मनुष्य में चाहिए सुलझा हुआ दृष्टिकोण, देश, काल , समय और व्यक्ति की सही परख , दृढ़ संकल्प शक्ति , पाथेय की पूर्ण तैयारी , अखंड आत्मविश्वास और स्वयं की पहचान।

मित्रों, आपने अब तक ये जान लिया होगा के किसी विचार का आधीन बनकर रहना कैसे होता है. खूंटे पर चोट की आवाज और गले पर रस्सी बाँधने के आभास ने उस ऊंट को ये विश्वास दिला दिया था के उसको बाँध दिया गया है जबकि वो स्वतंत्र था.

इसी तरह हम यदि औरों के विचारों को यदि हम अपने ऊपर हावी होने देते हैं तो हमारे सोचने समझने की क्षमता घटती जाती है और हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं.

ऊंचा उड़ो पर जमीन को मत भूलो

एक बार एक बहुत ही अधिक ज्ञानवान पिता थे. उनका अपने पुत्र के साथ बहुत मधुर और मित्र जैसा सम्बन्ध था. जब भी उनका पुत्र उनसे कुछ पूछता तो पिता उसको कोई न कोई व्यवहारिक उदाहरण देकर बात समझते थे.

एक दिन पुत्र ने अपने पिता से कहा, "पिताजी, ये सफल जीवन का अर्थ क्या है?"

पिता मुस्कुराये और प्यार से अपने पुत्र के सर पर हाथ फेरा और फिर पुत्र को अपने साथ पतंग उड़ाने के लिए ले गए. बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...

कुछ देर तक पुत्र चुप रहा पर जब उसने देखा के पतंग अब और ऊपर नहीं जा रही है तो उसने पिता से कहा, "पिताजी, मेरे विचार में ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें!! ये और ऊपर चली जाएगी..."

पिता ने मुस्कुरा कर अपने पुत्र की तरफ देखा और फिर धागा तोड़ दिया. पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आइ और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

पतंग को नीचे गिरता देख कर पुत्र के चेहरे पर उदासी छा गयी, पर पिता ने ठीक इसी समय पुत्र को कहना शुरू किया,

“बेटा.. 'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं. हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं जैसे: घर, परिवार, अनुशासन, माता-पिता आदि और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना. धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं बेटा!”

मित्रो, कितना सुन्दर उत्तर दिया इस पिता ने. अब आप अपने बारे में सोचें के पुत्र के रूप में आपने कितनी बार इस तरह के प्रश्न अपने पिता या अपने बड़ों से पूछे थे या पिता के रूप में आपने अपने बेटे या बेटी को उनके प्रश्नों के उत्तर दिए.

आजकल हम बस बच्चों को महंगे विद्यालयों में भेज कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और ये भूल जाते हैं के सबसे प्रभावशाली शिक्षा वो होती है जो एक बच्चे को घर में प्राप्त होती है.

कहने का तात्पर्य है के आज के आधुनिक जीवन में बहुत से ज्ञानवान लोग तो मिल जाते हैं पर ये जरूरी नहीं के वो सभी बुद्दिमान भी हों. ज्ञान किताबों से मिल सकता है पर बुद्धि नहीं. कुछ समय छोटे बच्चों के साथ भी बिताया कीजिये.

औरों की खुशियां ढूंढिए

एक बार एक सभा चल रही थी। उस सभा में लगभग पचास लोग भाग ले रहे थे।

सभा के शुरू होने के कुछ ही समय के बाद अध्यक्ष ने सभी भाग लेने वालों को एक एक करके बुलाया और सबके हाथ में एक एक गुब्बारा दिया और कहा, "अपने अपने गुब्बारे पर अपना नाम लिख दीजिये।

भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों ने मार्कर से अपने अपने गुब्बारे पर अपना नाम लिख दिया।  

 अध्यक्ष के आदेश के अनुसार गुब्बारों को एक दुसरे कमरे में रख दिया गया। अध्यक्ष ने अब सभी को एक साथ कमरे में जाकर पांच मिनट के अंदर अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने के लिए कहा।

सभी भाग लेने वाले तेजी से कमरे में घुसे और पागलों की तरह अपना नाम वाला गुब्बारा ढूंढने लगे।

पर इस अफरा-तफरी में किसी को भी अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिल पा रहा था…

पांच मिनट बाद सभी को बाहर बुला लिया गया।

 अध्यक्ष बोला, “अरे! क्या हुआ, आप सभी खाली हाथ क्यों हैं ? क्या किसी को अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिला?”

"नहीं! हमने बहुत ढूंढा पर हमेशा किसी और के नाम का ही गुब्बारा हाथ आया…” एक भाग लेने वाले ने  कुछ मायूस होते हुए बोला।

“कोई बात नहीं, आप लोग एक बार फिर कमरे में जाइये , पर इस बार जिसे जो भी गुब्बारा मिले उसे अपने हाथ में ले और उस व्यक्ति का नाम पुकारे जिसका नाम उसपर लिखा हुआ है," स्पीकर ने निर्दश दिया।

एक बार फिर सभी सभी भाग लेने वाले कमरे में गए, पर इस बार सब शांत थे , और कमरे में किसी तरह की अफरा- तफरी नहीं मची हुई थी। सभी ने एक दुसरे को उनके नाम के गुब्बारे दिए और तीन मिनट में ही बाहर निकल  आये।

अध्यक्ष ने गम्भीर होते हुए कहा , " बिलकुल यही चीज हमारे जीवन में भी हो रही है। हर कोई अपने लिए ही जी रहा है , उसे इससे कोई मतलब नहीं कि वह किस तरह औरों की मदद कर सकता है , वह तो बस पागलों की तरह अपनी ही खुशियां ढूंढ रहा है , पर बहुत ढूंढने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिलता।"

मित्रों, हम सभी अपनी अपनी खुशियों और अपने अपने स्वार्थ को खोजने में इतने मग्न हैं के हमको दूसरों का बिलकुल भी ध्यान नहीं रहता है।

हमारी ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी में छिपी हुई है। जब आप औरों को उनकी खुशियां देना सीख जाएंगे तो अपने आप ही आपको आपकी खुशियां मिल जाएँगी।

गले से नीचे तो उतारो

एक महान गुरु अपने शिष्यों के साथ वार्तालाप कर रहे थे. एक शिष्य ने खड़े होकर गुरु से कहा,  "गुरुजी हमेशा लोग प्रश्न करते है कि सत्संग का असर क्यों नहीं होता. मेरे मन में भी यह प्रश्न चक्कर लगा रहा है।"

गुरु समझ गए के शिष्य के मन में क्या चल रहा है. गुरु ने मुस्कुराते हुए उस शिष्य से कहा,  "वत्स ! जाओ, एक घडा शराब ले आओ ।"

शिष्य तो एक दम सन्न हो गया और सोचने लगा गुरु और शराब! उसको अपने कानो पर विशवास नहीं हो रहा था. वह सोचता ही रह गया ।

गुरु उस शिष्य की अवस्था खूब समझते थे. उन्होंने अपने उस शिष्य से फिर से कहा, “सोचते क्या हो ? जाओ एक घडा शराब ले आओ ।"

शिष्य सोचते सोचते वहां से चला गया और कुछ ही समय बाद शराब से भरा हुआ एक घड़ा लेकर आ गया और गुरु के समक्ष रख दिया और बोल, "गुरु जी आपकी आज्ञा अनुसार शराब ले आया हूँ."

गुरु ने शिष्य को आदेश दिया, "अब ये सारी शराब पी जाओ." शिष्य एकदम अचंभित हो गया और गुरु का मुख ताकने लगा.

गुरु ने एक बार फिर कहा, "सुना नहीं, हमने कहा है के ये सारी शराब पी जाओ."

इससे पहले के वो शिष्य शराब पीना शुरू करता, गुरु ने उसको फिर कहा, "शिष्य! एक बात का ध्यान रखना, पीना पर शीघ्र कुल्ला थूक देना, गले के नीचे मत उतारना ।"

शिष्य ने वही किया, शराब मुंह में भरकर तत्काल थूक देता, देखते देखते घडा खाली हो गया ।

कुछ ही देर बाद उसने आकर कहा, “गुरुदेव घडा खाली हो गया ।”

“तुझे नशा आया या नहीं?” पूछा गुरुने ।

"गुरुदेव! नशा तो बिल्कुल नहीं आया ।"

"अरे शराब का पूरा घडा खाली कर गये और नशा नहीं चढा?”

“गुरुदेव नशा तो तब आता जब शराब गले से नीचे उतरती, गले के नीचे तो एक बूंद भी नहीं गई फ़िर नशा कैसे चढता?”

"बस फिर सत्संग को भी उपर उपर से जान लेते हो, सुन लेते हों; गले के नीचे तो उतरता ही नहीं, व्यवहार में आता नहीं तो प्रभाव कैसे पडेगा? हुआ समाधान?”

मित्रों, शराब को मुहं में डाल कर बाहर फेंक देना ठीक वैसे ही है जैसे सत्संग में जाना और वहाँ कही गयी बातों पर ध्यान ना देना. नशे के लिए शराब को गले से नीचे उतारना ही होगा.

इसी तरह अच्छे विचारों और प्रवचनों को सुनने मात्र से कुछ नहीं होता, उनको जीवन में उतारना ही होता है.

दाता देनहार है

एक समय में एक बहुत ही बुद्धिमान बादशाह होता था. वो हर हफ्ते शुक्रवार के दिन नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद में जाता था.

वहाँ वो दो फकीरों को देखा करता था. नमाज़ पढ़ते समय एक फ़कीर बादशाह के बाएं तरफ और दूसरा उसके दाएं तरफ बैठा करता था.

बाधशाह के दाएं तरफ बैठा फ़कीर अल्लाह से कहता था, "मेरे अल्लाह आपने बादशाह को बहुत कुछ दिया है, मुझको भी दे दीजिये."

बाएं तरफ बैठा फ़कीर बादशाह की तरफ मुड़ता और कहता, "हे बादशाह, अल्लाह ने आपको बहुत दिया है, थोड़ा सा मुझ को भी दे दीजिये."

दाएं तरफ बैठा फ़कीर दुसरे फ़कीर से कहता, "पागल, अल्लाह से मांग. अल्लाह ने ही तो इस बादशाह को दिया है. तू बेवकूफ है जो बादशाह से मांग रहा है."

बाएं तरफ वाला फ़कीर उसको कहता, "तू चुप कर तू कुछ नहीं जानता है. ये बादशाह है यही देगा."

एक बार बादशाह ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मस्जिद में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा अल्लाह से मांगता है तो बेशक अल्लाह उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'अल्लाह देगा...' वाला, यह देख बादशाह से माँगा, मिल गया ना?"

खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़

अगले दिन जब बादशाह नमाज़ के लिए मस्जिद आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!

बादशाह नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"

फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"

बादशाह: "फिर?"

फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'अल्लाह देगा, अल्लाह देगा!'

बादशाह मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, अल्लाह ने उसे दे दिया!"

मित्रों, बादशाह मुस्कुराया क्योंकि वो समझ गया था के उस फ़कीर ने बादशाह से कुछ भी नहीं माँगा था पर अल्लाह ने खीर उस तक पहुंचा ही दी.

हमें विश्वास रखना चाहिए के सबसे बड़ा देने वाल तो भगवान् या अल्लाह है, फिर हम इंसानों से क्यों मांगते फिरते है. भीख माँगना उस फ़कीर का काम था पर वो कभी इंसानो से नहीं माँगता था और हमेशा अल्लाह को ही पुकारता था और अल्लाह इंसानों के माध्यम से उस तक कुछ न कुछ पहुंचा ही दिया करता था.

कर्म करते रहिये और लोभ कभी मत करिये, बस आप देखेंगे के आपका ईष्ट आपको आपकी आशाओं से बहुत अधिक देगा. धैर्य और विश्वास ही सफलता की कुंजी है.

दिलों की दूरियां

एक बार एक महापुरुष अपने शिष्यों के साथ वार्तालाप कर रहे थे. वार्तालाप के दौरान प्रश्नों और उत्तरों का सिलसिला चल निकला.

अचानक महापुरुष ने मुस्कुरा कर अपने शिष्यों से कहा, "आप सब ये बताईये के जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?

सभी शिष्य असमंजस में पड़ गए और बहुत सोचने के बाद एक शिष्य ने कहा, “हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।"

महापुरुष ने फिर से मुस्कुरा कर कहा, "जब दो लोग एक दुसरे के इतने पास होते हैं तो फिर वह चिल्लाते क्यों हैं? वो लोग धीरे धीरे भी तो बात चीत कर सकते हैं."

कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन महापुरुष संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।

महापुरुष ने फिर से मुस्कुरा कर कहा,  "जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा।

दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं।

प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह फुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं।

 इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि फुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।"

सभी शिष्या मंत्रमुग्ध से अपने गुरु के शब्दों को सुन रहे थे. महापुरुष ने फिर से कहना शुरू किया, "अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में ही बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़ जाएं कि वापिस आना ही मुमकिन न हो।"

मित्रों, दो व्यक्तियों में सभी दूरियां अधिकतर धन, विचारों में मतभेद, या और भौतिक कारणों से होती हैं. यदि हम ध्यान से सोचेंगे तो हम पाएंगे के हम भी बहुत बार अपने नजदीकी और प्रिय लोगों पर चिल्लाते हैं, पर उस समय हम ये भूल जाते हैं के दूसरा व्यक्ति हमारा कितना करीबी है.

प्यार और विनम्र व्यवहार ही ऐसी चीज़ें हैं जो हमको औरों की नज़रों में उचित स्थान दे सकती हैं. अगर आपके समक्ष भी कभी ऐसे स्तिथि आये जिसमे आप चिल्लाने ही लगे हों तो कृपया एक बार शांति से सोचियेगा.

दूरियां घटाने में ही महानता है दूरियां बढ़ाने में नहीं.

दो अलग दृष्टिकोण

बहुत समय पहले की बात है. एक गावं में दो साधू रहा करते थे. वो दिन भर भिक्षा मांगते थे और रात को मंदिर में आ जाते थे. वो दोनों उस मंदिर में पूजा करते थे.

वो दोनों साधू गाँव के बाहर एक झोपडी में रहा करते थे. एक दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी और आंधी भी चलने लगी. उस दिन रात को जब वो दोनों साधु अपनी झोपडी में वापिस आये उन्होंने देखा के आंधी और बारिश के कारण उनकी झोपडी आधी टूट चुकी थी.

उन दोनों साधुओं में से एक पहले अपनी झोपडी में पहुंचा. यह देखकर साधू क्रोधित हो उठता है और बुदबुदाने लगता है,” भगवान तू मेरे साथ हमेशा ही गलत करता है… में दिन भर तेरा नाम लेता हूँ , मंदिर में तेरी पूजा करता हूँ फिर भी तूने मेरी झोपडी तोड़ दी…

गाँव में चोर – लुटेरे झूठे लोगो के तो मकानों को कुछ नहीं हुआ, बिचारे हम साधुओं की झोपडी ही तूने तोड़ दी ये तेरा ही काम है …हम तेरा नाम जपते हैं पर तू हमसे प्रेम नहीं करता….”

तभी दूसरा साधू आता है और झोपडी को देखकर खुश हो जाता है नाचने लगता है और कहता है भगवान् आज विश्वास हो गया तू हमसे कितना प्रेम करता है ये हमारी आधी झोपडी तूने ही बचाई होगी वर्ना इतनी तेज आंधी – तूफ़ान में तो पूरी झोपडी ही उड़ जाती

ये तेरी ही कृपा है कि अभी भी हमारे पास सर ढंकनेको जगह है…. निश्चित ही ये मेरी पूजा का फल है , कल से मैं तेरी और पूजा करूँगा , मेरा तुझपर विश्वास अब और भी बढ़ गया है… तेरी जय हो !

मित्रों, आप लोगों को अब तक मालुम हो चुका होगा के यह कथा क्या कहना चाहती है. एक ही घटना को एक ही जैसे दो लोगों ने कितने अलग-अलग ढंग से देखा… हमारी सोच हमारा भविष्य तय करती है , हमारी दुनिया तभी बदलेगी जब हमारी सोच बदलेगी।

यदि हमारी सोच पहले वाले साधू की तरह होगी तो हमें हर चीज में कमी ही नजर आएगी और अगर दूसरे साधू की तरह होगी तो हमे हर चीज में अच्छाई दिखेगी ….

अतः हमें दूसरे साधू की तरह विकट से विकट परिस्थिति में भी अपनी सोच सकारात्मक बनाये रखनी चाहिए।

पुन्यात्मा चोर


एक बार एक रात एक चोर एक राजा के महल में घुस गया. उसने महल में चोरी की और आराम से बाहर निकल गया. जब राजा के सिपाहियों को पता चला के चोरी हो गयी है तो उन्होंने चोर के पदचिन्हों का पीछा करना शुरू कर दिया.

पीछा करते करते सिपाही शहर के बाहर आ गए और एक गावं में प्रवेश कर गए. जब वो सिपाही पदचिन्हों का पीछा करते करते गाँव के अंदर प्रविष्ट हुए तो उन्होंने देखा के एक संत सत्संग कर रहे हैं.

वहाँ बहुत से लोग संत के प्रवचनों को सुन रहे थे. सिपाहियों ने सोचा के वो चोर भी उन लोगों के बीच में कहीं बैठा होगा. सिपाही अपनी जगह पर खड़े होकर सत्संग के समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगे.

वहां उपस्थित संत कह रहे थे, "जो मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान की शरण चला जाता है, भगवान उसके सम्पूर्ण पापों को माफ कर देते हैं।

गीता में भगवान ने कहा हैः

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्व शक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

वाल्मीकि रामायण में आता हैः

जो एक बार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कह कर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है।

इसकी व्याख्या करते हुए संत श्री ने कहाः जो भगवान का हो गया, उसका मानों दूसरा जन्म हो गया। अब वह पापी नहीं रहा, साधु हो गया।

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्य भक्त होकर मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिए।कारण कि उसने बहुत अच्छी तरह से निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।

चोर वहीं बैठा सब सुन रहा था। उस पर सत्संग की बातों का बहुत असर पड़ा।

उसने वहीं बैठे-बैठे यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अभी से मैं भगवान की शरण लेता हूँ, अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। मैं भगवान का हो गया।'

सत्संग समाप्त हुआ। लोग उठकर बाहर जाने लगे। बाहर राजा के सिपाही चोर की तलाश में थे। चोर बाहर निकला तो सिपाहियों ने उसके पदचिह्नों को पहचान लिया और उसको पकड़ के राजा के सामने पेश किया।

राजा ने चोर से पूछाः इस महल में तुम्हीं ने चोरी की है न ? सच-सच बताओ, तुमने चुराया धन कहाँ रखा है?

चोर ने दृढ़ता पूर्वक कहाः "महाराज! इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की।"

सिपाही बोलाः "महाराज! यह झूठ बोलता है। हम इसके पदचिह्नों को पहचानते हैं। इसके पदचिह्न चोर के पदचिह्नों से मिलते हैं, इससे साफ सिद्ध होता है कि चोरी इसी ने की है।"

राजा ने चोर की परीक्षा लेने की आज्ञा दी, जिससे पता चले कि वह झूठा है या सच्चा।

चोर के हाथ पर पीपल के ढाई पत्ते रखकर उसको कच्चे सूत से बाँध दिया गया। फिर उसके ऊपर गर्म करके लाल किया हुआ लोहा रखा परंतु उसका हाथ जलना तो दूर रहा, सूत और पत्ते भी नहीं जले।

लोहा नीचे जमीन पर रखा तो वह जगह काली हो गयी। राजा ने सोचा कि 'वास्तव में इसने चोरी नहीं की, यह निर्दोष है।'

अब राजा सिपाहियों पर बहुत नाराज हुआ कि "तुम लोगों ने एक निर्दोष पुरुष पर चोरी का आरोप लगाया है। तुम लोगों को दण्ड दिया जायेगा।"

यह सुन कर चोर बोलाः "नहीं महाराज ! आप इनको दण्ड न दें। इनका कोई दोष नहीं है। चोरी मैंने ही की थी।"

राजा ने सोचा कि यह साधु पुरुष है, इसलिए सिपाहियों को दण्ड से बचाने के लिए चोरी का दोष अपने सिर पर ले रहा है।

राजा बोलाः तुम इन पर दया करके इनको बचाने के लिए ऐसा कह रहे हो पर मैं इन्हें दण्ड अवश्य दूँगा।

चोर बोलाः "महाराज! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, चोरी मैंने ही की थी। अगर आपको विश्वास न हो तो अपने आदमियों को मेरे पास भेजो।

मैंने चोरी का धन जंगल में जहाँ छिपा रखा है, वहाँ से लाकर दिखा दूँगा।"

राजा ने अपने आदमियों को चोर के साथ भेजा। चोर उनको वहाँ ले गया जहाँ उसने धन छिपा रखा था और वहाँ से धन लाकर राजा के सामने रख दिया।

यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा बोलाः अगर तुमने ही चोरी की थी तो परीक्षा करने पर तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला?

तुम्हारा हाथ भी नहीं जला और तुमने चोरी का धन भी लाकर दे दिया, यह बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। ठीक-ठीक बताओ, बात क्या है?

चोर बोलाः महाराज! मैंने चोरी करने के बाद धन को जंगल में छिपा दिया और गाँव में चला गया। वहाँ एक जगह सत्संग हो रहा था। मैं वहाँ जा कर लोगों के बीच बैठ गया।

सत्संग में मैंने सुना कि 'जो भगवान की शरण लेकर पुनः पाप न करने का निश्चय कर लेता है, उसको भगवान सब पापों से मुक्त कर देते हैं। उसका नया जन्म हो जाता है। इस बात का मुझ पर असर पड़ा और मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा।

अब मैं भगवान का हो लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। अब मैं भगवान का हो गया। इसीलिए तब से मेरा नया जन्म हो गया।

इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की, इसलिए मेरा हाथ नहीं जला। आपके महल में मैंने जो चोरी की थी, वह तो पिछले जन्म में की थी।

मित्रों, कितनी अद्भुत घटनाएं घटित होती हैं जीवन में! कैसा दिव्य प्रभाव है सत्संग का! मात्र कुछ क्षण के सत्संग ने चोर का जीवन ही पलट दिया। उसे सही समझ देकर पुण्यात्मा, धर्मात्मा बना दिया।

चोर सत्संग-वचनों में दृढ़ निष्ठा से कठोर परीक्षा में भी सफल हो गया और उसका जीवन बदल गया। राजा उससे प्रभावित हुआ, प्रजा से भी वह सम्मानित हुआ और प्रभु के रास्ते चलकर प्रभु कृपा से उसने परम पद को भी पा लिया।

सत्संग पापी से पापी व्यक्ति को भी पुण्यात्मा बना देता है। जीवन में सत्संग नहीं होगा तो आदमी कुसंग जरूर करेगा।

कुसंगी व्यक्ति कुकर्म कर अपने को पतन के गर्त में गिरा देता है लेकिन सत्संग व्यक्ति को तार देता है, महान बना देता है। ऐसी महान ताकत है सत्संग में!

प्रभु तेरे खेल निराले


एक दिन एक व्यक्ति किसी काम से अपने गावं से शहर जा रहा था. रास्ते में एक घना जंगल पड़ता था और उस व्यक्ति को उस जंगल से होकर जाना था.

जंगल से गुजरते समय उस व्यक्ति को बहुत जोर की प्यास महसूस हुई. उसने पास ही एक नदी में जाकर पानी पिया. वो अपनी यात्रा फिर जारी करने ही वाला था के उसकी निगाह नदी के किनारे बैठे एक गीदड़ पर गयी.

जब उस व्यक्ति ने ध्यान से देखा तो उसने पाया के वो गीदड़ चल फिर नहीं सकता था. यह देख उसे बड़ा अचरज हुआ की ये चल नहीं सकता तो फिर यह जीवित कैसे है.

वो अभी इन्ही विचारों में डूबा ही था के उसको एक शेर की बहुत भयंकर दहाड़ सुनाई दी. ..वो व्यक्ति एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और इंतजार करने लगा,.तभी वहां शेर आया जिसने एक ताजा शिकार मुंह में दबोचा हुआ था..

वह व्यक्ति सब ध्यान से देखता रहा. शेर शायद अपना पेट भर चुका था..इसलिए उसने उस शिकार को उस गीदड़ के सामने डाल दिया और चला गया.

वह व्यक्ति यह सब ध्यान से देख रहा था; .उसने सोचा की परमात्मा की लीला अपरंपार है वो सब के लिए व्यवस्था करता है.

तभी उसके मन में विचार आया की जब भगवान इस लाचार गीदड़ की मदद कर सकते है तो मेरी भी करेंगे ..भगवान में गहरी आस्था थी इसलिए वो वहीं नदी किनारे एक ऊँची चट्टान पर बैठ गया और भगवान की भक्ति करने लगा.....

एक दिन बिता, फिर दो दिन बीते, लेकिन कोई नहीं आया...उसकी हालत अब कमजोर होने लगी फिर भी हठ पकड़ लिया की भगवान मेरी मदद अवश्य करेंगे.

समय बीता और वह व्यक्ति मर गया..मरने के बाद सीधे भगवान के पास पहुंचा और भगवान से कहने लगा है!

भगवन मैंने देखा था अपनी आँखों के सामने.जब आप ने एक लाचार गीदड़ की सहायता की थी. मैंने आपकी जीवन भर सेवा की लेकिन आपने मेरी मदद नहीं की.

तब भगवान मुस्कराए और कहने लगे.तुम्हें क्या लगता है जब तुम जंगल में से जा रहे थे तब अपनी मर्जी से नदी पर गए थे और यह सब कुछ देखा था.

नहीं तुझे प्यास भी मैंने लगाईं थी और तुझे नदी पर भी मैंने ही भेजा था;.लेकिन अफसोस इस बात का की मैंने तुझे शेर बनने के लिए जंगल में भेजा था. लेकिन तू गीदड़ बनकर आ गया.

मित्रों, एक बात तो बिलकुल निश्चित है के भगवान क्या करता है और क्या करवाता है ये एक कभी ना खुलने वाला रहस्य है. जीवन में ऐसे कई मौके आते है जब भगवान हमें हमारे वास्तविक रूप को पहचानने के लिए मौके देते है.

लेकिन यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम उसे किस रूप में ग्रहण कर रहे है..हम शेर बनकर लाचार और दीन व्यक्तियों की मदद करे या फिर सब कुछ होते हुए भी गीदड़ बन जाये..

वह लाचार था क्योंकि वह बेसहारा था लेकिन आप नहीं..आप में वह काबलीयत है की आप अपना जीवन अच्छा बनाकर उन लोगों को मदद कर सकते है जो हालात की वजह से बेबस जीवन जी रहे है.

प्रेम की शक्ति

एक दिन मृत्यु देवता ने अपने एक दूत को पृथ्वी पर भेज. पृथ्वी पर एक स्त्री की मृत्यु हो गयी थी और दूत को उस स्त्री की आत्मा लानी थी.

देवदूत जब उस स्त्री के घर पहुंचा तो वो दुविधा में पद गया क्योंकि उस इस्त्री की तीन बेटियां थी और एक तो अभी भी उस स्त्री के स्तन को चूस रही थी. एक बेटी रो रही थी और तीसरी बेटी रो रो कर सो चुकी थी.

उस स्त्री के पति की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी. देवदूत सोचने लगा इस इस्त्री के बाद इन छोटी छोटी बेटियों का क्या होगा क्योंकि उनकी देखभाल करने वाल वहां कोई भी नहीं था.

देवदूत बिना आत्मा लिए ही वापिस आ गया और मृत्यु के देवता को पूरी कहानी सुनाई.

देवदूत ने कहा, "महाराज, मैं उस स्त्री की आत्मा को नहीं ला सका क्योंकि उसकी बेटियां अभी बहुत छोटी हैं और उनकी देखभाल करने वाल कोई भी नहीं है."

मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा, जिसकी मर्जी से मौत होती है, जिसकी मर्जी से जीवन होता है! तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी।

और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।

इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है।

देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा?

 उसे जमीन पर फेंक दिया गया। एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा।

यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था। उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए।

इस आदमी को कुछ खाने-पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ।

लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।

उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी-चिल्लायी।

और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।

 देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी।

लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है।

जिसके आते ही हजारों खुशियों के द्वार खुल जाएंगे। तो देवदूत हंसा। उसे लगा, अपनी मूर्खता–क्योंकि यह पत्नी भी नहीं देख पा रही है कि क्या घट रहा है!

जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा।

आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा।

एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं।

क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे।

लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए?

देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा। तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।

 भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर चाहिए।

तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं।

लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं।

दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कि कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है।

और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं।

तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।

और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं।

एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है?

उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को पाल लिया।

अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख औ दीनता औ दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो रहा है।

देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका।

और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।

मित्रो, इस जीवन को समझना बहुत कठिन है, परन्तु एक बाद तो पक्की है के प्यार ही वो शक्ति है जो मनुष्यों को जीवित रखती है और अगर प्यार न होता लोगों के दिलों में तो वो तीनो बच्चियां भी जीवित ना रहती.

आप अगर अपने आप को बीच में लाना बंद कर देंगे तो आपको अपने आप ही मार्ग मिल जाएगा.  फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। छोड़ दो उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद।

जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। आप बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी हो, आपके  धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता आप मत करना।

मां का कर्ज

एक पति और उसकी पत्नी में झगड़ा चल रहा था. पत्नी बोली, "मुझे पूरा विश्वास है के मेरी अंगूठी तुम्हारी माँ ने ही चुराई है."

पति ने भी गुस्से से कहा, "तुम अपनी हद से आगे निकल रही हो! तुम कैसे कह सकती हो की मेरी माँ चोर है?"

पत्नी बोली, "तुम्हारी माँ के सिवाए इस कमरे में कोई भी नहीं आया था. अंगूठी मैंने मेज़ पर रखी थी."

पति बहुत देर तक सुनता रहा पर बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे मारा.

उनकी शादी सिर्फ कुछ महीने पहले ही हुई थी. पत्नी सहन ना कर सकी. उसने अपना सामान एक बैग में रखना शुरू कर दिया, पर वो कमरे से बाहर निकलने से पहले रुकी और पति से कहा, "आपको अपनी माँ पर इतना अधिक विश्वास क्यों है?"

पति ने अपनी पत्नी को जवाब देना शुरू किया. उस समय उसकी माँ दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी. बेटे का जवाब सुनकर माँ की आँखें भर आईं.

पति ने अपनी पत्नी से कहना शुरू किया, “जब मैं बहुत छोटा था मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया. मेरी माँ ने लोगों के घरों में झाड़ू पोछा लगाने का काम शुरू कर दिया और जो कुछ भी वो कमाती थी उस पैसे से सिर्फ एक वक्त का खाना ही आता था. मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और कहती थी माँ की रोटियां उसके डिब्बे में है. वो कहती बेटा तुम खा लो."

मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही खाना है
मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है

आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,

वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की भूखी होगी ....यह मैं सोच भी नही सकता
तुम तो तीन महीने से मेरे साथ होमैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस वर्षों से देखा है...

यह सुनकर मां की आंखों से छलक उठे वह समझ नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज...

मैं औरों जैसा नहीं हूँ

एक शहर में एक लड़का रहता था. वो बहुत ही गरीब था और उसको पेट भर खाना भी भाग्य से ही मिलता था.

उसके माता पिता मेहनत मज़दूरी करके बहुत मुश्किल से दो वक़्त का खाना जुटा पाते थे. वो गरीब लड़का किसी तरह दस कक्षा तक पढ़ गया.

एक दिन उसको मालुम हुआ के किसी दफ्तर में एक चपरासी की जगह खाली है. वो उस दफ्तर में पहुँच गया.

वो एक कंपनी का दफ्तर था. मालिक ने उस गरीब लड़के से पूछा, "तुम्हारी इ मेल आई डी क्या है?"

लड़के ने डरते डरते कहा, "मेरे पास इ मेल आई डी नहीं है."

ये सुनकर मालिक ने उसे बड़ी घृणा दृष्टि से देखा और कहा,  "कि आज दुनिया इतनी आगे निकल गयी है , और एक तुम हो कि इ मेल आई डी तक नहीं है , मैं तुम्हें नौकरी पर नहीं रख सकता ।"

ये सुनकर लड़के के आत्म सम्मान को बहुत ठेस पहुंची, उसकी जेब में उस समय पचास साठ  रुपये थे । उसने उन रुपयों से 1 किलो सेब खरीद लिए और चलने लगा.

वह घर घर जाकर उन सेबों को बेचने लगा और ऐसा करके उसने 80 रुपये जमा कर लिए । अब तो लड़का रोज सेब खरीदता और घर घर जाकर बेचता ।

सालों तक यही सिलसिला चलता रहा लड़के की कठिन मेहनत रंग लायी और एक दिन उसने खुद की कंपनी खोली जहाँ से विदेशों में सेब सप्लाई किये जाते थे ।

उसके बाद लड़के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और जल्दी ही बहुत बड़े पैमाने पर अपना बिज़नेस फैला दिया और एक सड़क छाप लड़का बन गया अरबपति...

एक दिन कुछ मीडिया वाले लड़के का इंटरव्यू लेने आये और अचानक किसी ने पूछ लिया – “सर आपकी इ मेल आई डी क्या है?”

अरबपति ने कहा, "मेरे पास इ मेल आई डी नहीं है."

ये सुनकर सारे लोग चौंके कि एक अरबपति आदमी के पास एक इ मेल आई डी तक नहीं है ।

अरबपति ने हंसकर जवाब दिया, “मेरे पास इ मेल आई डी नहीं है इसीलिए मैं अरबपति हूँ , अगर इ मेल आई डी होती तो मैं आज एक चपरासी होता.:

मित्रों, यह बहुत ही प्रभावशाली कहानी है. हर व्यक्ति में कोई ना कोई प्रतिभा होती है बस वो व्यक्ति अपनी प्रतिभा का सही प्रयोग नहीं करता और इधर उधर भटकता रहता है.

कभी भी अपनी किसी से तुलना मत कीजिये क्योंकि आप विशेष हैं और आप जो कर सकते हैं वो दुसरे नहीं कर सकते. आप मेरी इन प्रेरणा कथाओं के विंडोज़ को देखकर शायद सोच रहे होंगे के शायद मेरा यही काम है.

नहीं में पेशे से अंग्रेजी साहित्य का व्यक्ति हूँ और बहुत वर्षों तक विष्वविद्यालय के छात्रों को पढ़ाया है पर अचानक मन में आया के इतनी अंग्रेजी की किताबें लिखी अब कुछ ऐसा करना चाहिए जो अधिक लोगों तक पहुँच सके.

बस इसी धुन में समय निकाल कर ये छोटे छोटे वीडियो बनाने लगा. तीन वर्ष लगातार काम किया और आज मेरे सात हज़ार वीडियो यूट्यूब पर चल रहे हैं. हर व्यक्ति में कोई विशेषता होती है आप अपनी पहचानिए और निकल पढ़िए....

स्वर्ग प्राप्ति

यह कथा लगभग दो हज़ार साल पहले की है जब महात्मा बुद्ध लोगों को अंधविश्वास और पाखण्ड से दूर रहने के बारे में शिक्षा दिया करते थे। उस समय में लोग विभिन्न प्रकार के कर्म काण्ड किया करते थे ताकि उनको उनकी मृत्यु के पश्चात स्वर्ग प्राप्ति हो सके।

कर्म काण्ड के दौरान एक मिटटी के घड़े में कुछ छोटे छोटे पत्थर दाल दिए जाते थे और पूजा और हवन किया करते थे और इसके बाद उस घड़े पर किसी धातु की वस्तु से प्रहार किया जाता था।

अगर घड़ा टूट जाता था तो वो मानते थे के आत्मा मुक्त हो गयी है और स्वर्ग पहुँच गयी है। इस तरह वो विश्वास करते थे के मरने वाले व्यक्ति की आत्मा पाप से मुक्त हो जाती थी।

लोग इतने सीधे साढ़े और भोले बाले थे के वो कभी भी ये नहीं सोचते थे के घड़ा तो मिटटी का होता तो और वो धातु की वस्तु से प्रहार करने से टूटना ही होता था। ये पाखण्ड पूरा होने के बाद पंडित बहुत दान दक्षिणा लेते थे।

एक दिन एक युवक के पिता की मृत्यु हो गयी। उस युवक ने महात्मा बुद्ध की मदद लेने की सोची। वो अपने पिता की आत्मा की शुद्धि कराना चाहता था।

उसका विश्वास था के महात्मा बुद्ध अवश्य ही आत्मा को स्वर्ग दिलाने का कोई और बेहतर और निश्चित रास्ता जानते होंगे। इसी सोच के साथ वो महात्मा बुद्ध के समक्ष पहुंचा।

महात्मा बुद्ध के समक्ष पहुंचकर उसने हाथ जोड़ कर कहा , “हे महात्मन! मेरे पिता जी नहीं रहे, कृपया आप कोई ऐसा उपाय बताएं कि यह सुनिश्चित हो सके कि उनकी आत्मा को स्वर्ग में ही स्थान मिले।”

महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और युवक को कहा , “ठीक है, जैसा मैं कहता हूँ वैसा करना…तुम उन पंडितों से दो घड़े लेकर आना। एक में पत्थर और दूसरे में घी भर देना। दोनों घड़ों को नदी पर लेकर जाना और उन्हें इतना डुबोना कि बस उनका उपारी भाग ही दिखे।

उसके बाद पंडितों ने जो मन्त्र तुम्हे सिखाये हैं उन्हें जोर-जोर से बोलना और अंत में धातु से बनी हथौड़ी से उनपर नीचे से चोट करना। और ये सब करने के बाद मुझे बताना कि क्या देखा?”

युवक बहुत खुश था उसे लगा कि बुद्ध द्वारा बताई गयी इस प्रक्रिया से निश्चित ही उसके पिता के सब पाप काट जायेंगे और उनकी आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

अगले दिन युवक ने ठीक वैसा ही किया और सब करने के बाद वह बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ।

बुद्ध ने पूछा, “आओ पुत्र, बताओ तुमने क्या देखा?”

युवक बोला, “मैंने आपके कहे अनुसार पत्थर और घी से भरे घड़ों को पानी में डाल कर चोट की। जैसे ही मैंने पत्थर वाले घड़े पर प्रहार किया घड़ा टूट गया और पत्थर पानी में डूब गए।

उसके बाद मैंने घी वाले घड़े पर वार किया, वह घड़ा भी तत्काल फूट गया और घी नदी के बहाव की दिशा में बहने लगा।”

बुद्ध बोले, “ठीक है! अब जाओ और उन पंडितों से कहो कि कोई ऐसी पूजा, यज्ञ, इत्यादि करें कि वे पत्थर पानी के ऊपर तैरने लगें और घी नदी की सतह पर जाकर बैठ जाए।”

युवक हैरान होते हुए बोला, “आप कैसी बात करते हैं? पंडित चाहे कितनी भी पूजा करे लें पत्थर कभी पानी पे नहीं तैर सकता और घी कभी नदी की सतह पर जाकर नहीं बैठ सकता!”

बुद्ध बोले, “ बिलकुल सही, और ठीक ऐसा ही तुम्हारे पिताजी के साथ है। उन्होंने अपने जीवन में जो भी अच्छे कर्म किये हैं वो उन्हें स्वर्ग की तरफ उठाएंगे और जो भी बुरे कर्म किये हैं वे उन्हें नरक की और खीचेंगे।

और तुम चाहे जितनी भी पूजा करा लो, कर्मकाण्ड करा लो, तुम उनके कर्मफल को रत्ती भर भी नहीं बदल सकते।”

युवक बुद्ध की बात समझ चुका था कि मृत्यु के पश्चात स्वर्ग जाने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है जीवित रहते हुए अच्छे कर्म करना।

मित्रों, इसी तरह से हमारे समाज में आज भी बहुत से ऐसे अंधविश्वास और पाखण्ड हैं जो लोगों को बहुत  प्रभावित करते हैं और उनकी प्रगति में बाधा बन जाते हैं.

ऐसे कर्म कांडों को धार्मिक पंडित और धर्म के ठेकेदार भगवान् से जोड़ देते हैं जिससे लोग डर जाते हैं और उनके विरोध में कुछ भी बोलने का साहस नहीं कर सकते. विश्वास रखना अपने मन की आस्था है पर इस तरह लोगों को धर्म के नाम पर डराना ठीक नहीं.

आप भी अपने जीवन का विश्लेषण करिये और देखिये के आप इन कर्म कांडों और अंधविश्वासों से कितना प्रभावित हैं.

हम जानवर भी नहीं रहे

एक गाँव के बाहर एक बहुत पुराना मंदिर था. उस मंदिर में बहुत से कबूतर ख़ुशी ख़ुशी रहा करते थे. मंदिर का वार्षिक उत्सव नजदीक था. मंदिर का जीर्णोद्धार होने लगा. ऐसे समय में कबूतरों को उस मंदिर को छोड़कर पास के ही एक गिरजाघर में जा कर रहना पड़ा.

उस चर्च या गिरजाघर में पहले से ही कुछ कबूतर रहा करते थे पर वो नए कबूतरों के आने से क्रुद्ध नहीं हुए और सभी कबूतर साथ साथ राजी ख़ुशी रहने लगे.

जब वर्ष के अंत में क्रिसमस का समय नजदीक आया तो चर्च का भी जीर्णोद्धार होने लगा और सजावट की जाने लगी. अब कबूतरों को चर्च को भी छोड़कर जाना पड़ा. उन्होंने अपने लिए रहने की कोई नयी जगह तलाश करनी शुरू कर दी.

भाग्य ने उन कबूतरों का साथ दिया और उन सबको पास के एक मस्जिद में उन्हे जगह मिल गयी और मस्जिद में रहने वाले कबूतरों ने उनका खुशी-खुशी स्वागत किया।

उस मस्जिद में भी पहले से ही कुछ कबूतर रहते थे पर वो भी नए आये कबूतरों से क्रुद्ध नहीं हुए और सभी कबूतर ख़ुशी ख़ुशी साथ साथ रहने लगे.

जब रमजान का समय आया तो मस्जिद की भी सफाई शुरू हो गयी.  सभी कबूतर वापस उसी प्राचीन मंदिर की छत पर आ गये।

एक दिन मंदिर की छत पर बैठे कबूतरों ने देखा कि नीचे चौक में धार्मिक उन्माद एवं दंगे हो गये।

छोटे से कबूतर ने अपनी माँ से पूछा " माँ ये कौन लोग हैं ?"

माँ ने कहा " ये मनुष्य हैं"।

छोटे कबूतर ने कहा " माँ ये लोग आपस में लड़ क्यों रहे हैं ?"

माँ ने कहा " जो मनुष्य मंदिर जाते हैं वो हिन्दू कहलाते हैं, चर्च जाने वाले ईसाई और मस्जिद जाने वाले मनुष्य मुस्लिम कहलाते हैं।"

छोटा कबूतर बोला " माँ एसा क्यों ? जब हम मंदिर में थे तब हम कबूतर कहलाते थे, चर्च में गये तब भी कबूतर कहलाते थे और जब मस्जिद में गये तब भी कबूतर कहलाते थे, इसी तरह यह लोग भी मनुष्य कहलाने चाहिये चाहे कहीं भी जायें।"

माँ बोली " मेनें, तुमने और हमारे साथी कबूतरों ने उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव किया है इसलिये हम इतनी ऊंचाई पर शांतिपूर्वक रहते हैं।

इन लोगों को उस एक ईश्वरीय सत्ता का अनुभव होना बाकी है , इसलिये यह लोग हमसे नीचे रहते हैं और आपस में दंगे फसाद करते हैं।"

मित्रो, कितने दुर्भाग्य की बात है के सभ्यता के हज़ारों वर्ष के इतिहास के बाद भी हम मनुष्यों ने साथ साथ रहना नहीं सीखा है. हम अपने आप को रोज नए नए वर्गों और धर्मों में बांटते रहते हैं.

जब मैं जानवरों को देखता हूँ तो अनुभव होता है के वो तो अभी भी पूर्ण और शुद्ध जानवर ही हैं और सब आपस में मिलकर रहते हैं. एक ही जाती और प्रकार के जानवर आपस में बहुत दुर्लभ अवस्था में ही क्रुद्ध होते हैं.

अब ऐसा लगता है के मनुष्य जिसका क्रमिक विकास जानवरों से ही हुआ है धीरे धीरे कम जानवर होता चला गया है और एक मनुष्य अब दुसरे मनुष्य को कितनी आसानी से मार देता है.

जानवर लाखों वर्षों में भी नहीं बदले और प्रभु अथवा प्रकृति के कितने नजदीक हैं, पर यह रोज बदलता मनुष्य कितना कम जानवर हो गया है और अपने जैसे मनुष्यों को मार कर अपने आप को सभ्य कहता है.

विचार कीजियेगा और जब आप ध्यान से जानवरों को समझने की कोशिश करेंगे तो आपको लगेगा की मनुष्य जीवित प्राणियों में प्रभु या प्रकृति से सबसे अधिक दूर है.

हम पापी भी गत पाहि

उन दिनों श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज अमृतसर में रहा करते थे. एक दिन बहुत से श्रद्धालु उनके दर्शन करने के लिए काबुल, अफगानिस्तान, से अमृतसर आये.

आई हुई संगत के सभी श्रद्धालुओं ने अपने जूते और चप्पलें बाहर उतार दिए और गुरुद्वारा साहिब में प्रवेश किया.

जब गुरु अर्जुन देव जी को उनके आने की जानकारी मिली तो गुरु जी बहार आये. आये हुए लोग गुरु साहिब को नहीं देख सके.

सब लोग एक बार फिर गुरुद्वारा साहिब से बाहर आ गए. वो लोग देख कर दग रह गए के गुरु अर्जुन देव जी उनलोगों के जूते और चप्पलें साफ़ कर रहे थे. यह देखकर काबुल से आये हुए लोग हैरान और परेशान हो गए.

उनमें से कुछ लोग गुरु साहिब की तरफ दौड़े और गुरु साहिब के हाथ पकड़ लिए और उनसे माफ़ी मांगने लगे.

गुरु साहिब ने ये वचन उचारे”

"गुरसिखां की हर धूड़ देह
हम पापी भी गत पाहि।।

अर्थात जो सँगत इतनी दूर से गुरु रामदास जी के दरबार अमृतसर में पहुंची है उस सँगत के चरणों की धुल भी दास अर्जन को मिल जाए तो दास के पाप भी धुल जाएंगे।

मित्रों, क्या आज लोगों में औरों को इतना सम्मान देने की परंपरा बाकी है? धन्य है गुरु साहब जिन्होंने हर एक बात को पहले खुद किया और बाद में सँगत ने अनुकरण किया. किसी बात में जबरदस्ती नहीं।

ऐसे गुरु जो खुद को पापी कहते हैं और जो साधारण लोगों के जूते चप्पल साफ़ करते हैं क्या साधारण मनुष्य हो सकते हैं. ऐसे महान गुरुओं से हमें सीखना चाहिए के हर व्यक्ति विशेष है और हर व्यक्ति को सामान सम्मान देना चाहिए.

मित्रों, आज हम ऐसे महान गुरुओं के द्वारा दी गयी शिक्षा को भूल गए हैं और अपने साथी मानवों को तुच्छ मानते हैं और सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे में ही सोचते हैं.

हमारे हाथ में कुछ नहीं

एक गाँव में एक बहुत पुराना मंदिर था. उस मंदिर में भगवान की बहुत सुन्दर मूर्ती थी. मंदिर और भगवान् की सेवा के लिए एक सेवक भी था.

एक दिन उस सेवक ने भगवान की मूर्ती के सामने हाथ जोड़ कर खड़े होकर कहा, "प्रभु, आप इतने वर्षों से एक ही स्थान पर खड़े हैं. आप थक गए होंगे. मैं एक दिन के लिए मूर्ती बन जाता हूँ और आप मेरा रूप लेकर एक दिन घूम आइए.

भगवान कुछ देर सोचने के बाद ऐसा करने को तैयार हो गए परन्तु उन्होंने एक शर्त रख दी, " जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना. कुछ बोलना नहीं. मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है."

सेवक ने उत्तर में हाथ जोड़ दिए और प्रभु की बात मान ली और प्रभु के स्थान पर मूर्ति बनकर खड़ा हो गया.

सबसे पहले एक उद्योगपति वहां आता है और मूर्ति के समक्ष खड़ा हो कर बोला, "प्रभु मैंने एक नया उद्योग लगाया है आप उसको सफल कर दीजिये."

जब वो उद्योगपति माथा टेकने के लिए नीचे झुका उसका बटुवा नीचे गिर गया पर उसको वो नहीं दिखा और वो मंदिर से बाहर चला गया.

भगवान के स्थान पर मूर्ती बना हुआ सेवक बहुत विचलित हो जाता है और उसका मन होता है के वो उस उद्योगपति को बता दे के उसका बटुवा गिर गया है पर प्रभु की शर्त उसको रोक देती है.

थोड़ी देर बाद एक बहुत ही गरीब व्यक्ति आता है और प्रभु की मूर्ती के समक्ष खड़ा होकर बोला, "प्रभु, मेरे घर में खाने को कुछ भी नहीं है. आप मेरे परिवार को कुछ खाने को दे दीजिये."

अचानक उस गरीब व्यक्ति ने जमीन पर पड़ा हुआ बटुवा देखा. उसने वो बटुवा उठा लिया और भगवान को धन्यवाद देकर मंदिर से बाहर चला गया.

कुछ देर बाद एक नाविक आता है और मूर्ती के समक्ष खड़ा होकर बोला, "प्रभु मैं एक लम्बी समुद्री यात्रा पर जा रहा हूँ. मेरे जहाज और सब लोगों की रक्षा करना."

ठीक उसी समय वो पहले वाल उद्योगपति एक सिपाही के साथ मंदिर में आया और बोला, "मेरे बाद ये नाविक ही मंदिर में आया है और इसने ही मेरा बटुवा लिया है. आप इसको पकड़ लें."

सिपाही ने नाविक को हथकड़ी पहना दी और लेकर जाने ही वाल था के मूर्ती बना हुआ सेवक बोल पड़ा, "बटुवा इसने नहीं गरीब व्यक्ति ने लिया है जो इससे पहले मंदिर आया था."

सिपाही जाकर उस गरीब व्यक्ति को पकड़ लेता है और उसको कारागार में बंद कर देता है.

शाम को जब प्रभु वापिस आये तो सेवक ने उनको पूरा किस्सा सुनाया. प्रभु ने कहा, "तुमने किसी का भी काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ दिया है."

सेवक सर झुकाए चुपचाप प्रभु को सुनता रहा. प्रभु ने कहा, "वह व्यापारी गलत धंधे करता है. अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था. इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था. पर्स मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते."

सेवाक बहुत ध्यान से प्रभु के एक एक शब्द को सुन रहा था. प्रभु ने फिर कहा, " रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था.अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती. उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती. तुमने सब गड़बड़ कर दी."

मित्रों, हमारे जीवन में भी बहुत बार ऐसे ही कई समस्याएं आती हैं और हम सोचते हैं के ये हमारे साथ ही क्यों हुआ. सब चीजों के पीछे भगवान की योजना होती है. अब जब आपके जीवन में कोई समस्या आये तो आप निराश मत होना और इस कथा को याद करना.


Online Academy